बुक्सा जनजाति समाज की होली

 बुक्सा जनजाति समाज की होली 


बुक्सा जनजाति समाज में पुरुष और महिलाएं होली अलग अलग खेलती है।

पुरूष होली दिन में खेलते हैं और महिलाएं होली रात में खेलती हैं महिलाओं की होली कई दिनों तक चलती हैं वहीं पुरुषों की होली एक दिन की होती है पहले पुरूषों की होली भी कई दिनों तक खिलती थी लेकिन बदलते ज़माने के अनुसार अब पुरुष सिर्फ एक दिन ही होली खेलते हैं। होली को बुक्साड़ी भाषा में होरी कहते हैं और इसमें पापड़ और गेहूं व चावल के आटे की पुड़ी बनाई जाती है और अपने अपने घर से 7 या 5 कंडे( उपले ) ले जाकर किसी खेत में रखते हैं सबसे पहले होली गांव का पधान (मुखिया) रखता है। उसके बाद गांव वाले रखते हैं जिसमें थोड़े चावल, पापड़ गेहूं व चावल के आटे की पुड़ी पूजी जाती है और सुबह 4 बजे पधान के द्वारा होली में आग लगा दी जाती है फिर सुबह सुबह पूरे गांव की महिलाएं अपने घर का कूड़ा कवाड लाकर जलती हुई होली में डालती है । इसका मतलब होता है हमने कूड़ा कवाड के रूप में अपने घर की बुराई को जला दिया फिर उसी होली में रंग,गुलाल अभीर आदि को पूजती है और उसके बाद नगराई(मंदिर) में भी अभीर को पूजती है। फिर सब लोग महिला और पुरुष हर घर जाकर माथे पर टीका लगाकर होली की शुरुआत करते हैं बड़ों का चरण स्पर्श या राम राम करके आशीर्वाद लेते है और एक दूसरे के गले मिलकर होली की शुभकामनाएं देते है। फिर पधान द्वारा होली खेलने के लिए पूरे गांव के बुज़ुर्ग पुरूषों को बुला कर होली खिलवाई जाती है सर्वप्रथम होली में जाकर खेली जाती हैं फिर नगराई(मंदिर) में जाकर खेली जाती है उसके बाद जिनके घर में फगवा (शादी या लड़का )हुआ है उसके घर जाकर होली का फगवा(पैसा के रूप) में मांगा जाता है|और फिर घर घर जाकर होली खेली जाती जो पैसा एकत्रित होता है उस पैसे को अच्छे काम में लगाया जाता और सेम इसी तरह रात को महिलाएं भी होली खेलती है। आप सभी को होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

Buksa Parivar

I am Amar Singh youtuber channel name Buksa Parivar

Post a Comment

Previous Post Next Post